"औषधीय तत्वों से भरपूर आंवला"

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जलवायु एवं मिट्टी 

आंवले की खेती शुष्क क्षेत्रोंमें आसानी से की जा सकती है.यह उष्ण तथा उपोष्ण दोनोंप्रकार की जलवायु मेंसफलतापूर्वक उगाया जा सकताहै . शुरूआत के 2 - 3 वर्षों तकपौधों को लू एवं पाले से बचानाअति आवश्यक है . बाद मेंविशेष प्रभाव नही पड़ता है ,आंवले की अच्छी खेती के लिएहलकी या भरी मिट्टी या पानी केनिकास वाली दोमट मिट्टी बहुतबढि?ा होती है . यह सुखी एवंक्षारीय मिट्टी में भी उगाया जाताहै. इसके लिए 2 मीटर गहरीभूमि की आवश्यकता होती है 

प्रवर्धन

आंवले का प्रवर्धन बीजतथा वानस्पतिक दोनों विधियोंद्वारा किया जाता है. मूलवृन्त केलिए बीज पौधा 3-4 माहपुराना होना चाहिए. इसकाप्रवर्धन कलम द्वारा भी सफलतापूर्वक किया जाता है. आंवले केपुराने वृक्षों पर शिखर रोपण भीकिया जा सकता है. इससेनिकले हुए नए प्ररोहों पर शील्डकलिकायन द्वारा अच्छी कलिकालगा दी जाती है. इससे निम्नकोटि के बीज पेड़ उच्च कोटि मेंपरिवर्तित किए जा सकते हैं.

पौधे लगाना

पौधे लगाने से पहले गहरीजुताई करके खेत को समतलकरें. इसके पौधों को 8&8मीटर की दूरी पर जून-जुलाई केमहीने में पहले से तैयार किएगए गड्ढों में लगाया जाता है. पौधेलगाने के लिए 1&1&1 मीटरआकर के गड्ढे खोदे जाते हैं. इनगड्ढों में 10-15 कि.ग्रा. गोबरकी सडी खाद तथा 50-100ग्राम क्यूनालफास 1.5 प्रतिशतचूर्ण प्रति गड्ढे के हिसाब सेमिलाकर गड्ढों में भर देते हैं.

अन्य कृषि क्रियाएँ

काफी देखभाल के बावजूदभी पेड़ लगाने के बाद इसके पत्तेझाड़ जाते हैं. परन्तु थोड़े समयबाद ही फि? लग आते हैं. इसकेपौधों को वर्षा एवं सर्द ऋतु मेंसिंचाई की आवश्यकता नहींपड़ती है. मार्च के महीने में जबकपोले निकलने लगें तो सिंचाईकरना प्रारम्भ कर देते हैं. जूनमाह में 15 दिन के अन्तर परसिंचाई करनी चाहिए. पौधे कोसुपर फॉस्फेट प्रति पौधा तथाजुलाई में 1 कि0ग्रा0 किसानखाद दूसरी बार डालें. इसकेअलावा 30 ग्राम नाइट्रोजनकिस्मेंबनारसी: इसके फल बड़े आकर के, औसत साइज 5से.मी., अचार बनाने के लिए उपयुक्त है .चकैया: फल बड़े आकार के, औसत साइज 3-4 सें.मी.,अचार बनाने के उपयुक्त, विटामिन सी की मात्रा सर्वाधिक .हाथीझूल (फ्रांसिस): फल बड़े आकर के बीच में थोड़ेदबे हुए, हरे रंग के 6 धारियों वाले, मुरब्बा के लिए उपयुक्त .एन.ए.- 7: इसके फल बड़े आकर के, औसत वजन प्रतिफल 40-50 ग्राम .कृष्णा: इसके फल मध्यम आकर के 6 - 8 धारियों वाले,फलों में रेशे कम तथा फल पारदर्शी होते हैं .प्रतिवाढ़स उम्र के हिसाब से प्रतिपेड़ 10 वर्ष तक डाले व 10 वर्षकी आयु के बाद 700-900ग्राम नाइट्रोजन प्रति वर्ष प्रति पेड़ डालें

फलन 

वानस्पतिक विधि द्वारातैयार किया गया पौधा 4-5 वर्षकि आयु में फल देना प्रारम्भ करदेता है. फूल मार्च-अप्रेल मेंआते हैं, तथा नवम्बर-दिसम्बरमें फल पाक जाते हैं. इसकीफसल फ?वरी माह में लेनीचाहिए. क्योंकि इस समय फलोंमें विटामिन सी की मात्रासर्वाधिक होती है. एक पेड़ सेलगभग 1.5-2 क्विंटल पैदावारहो जाती है. 

रोकथाम के उपायइस 

कीड़े को नियंत्रित करनाबहुत ही कठिन है. इसलिए जोभी फल पेड़ से गिर जाए उसेतथा पेड़ की सूखी पत्तियों औरशाखाओं को इका करके नष्टकर देना चाहिए. इससे इस कीड़ेकी भी रोकथाम किसी सीमा तकहो जाती है.

प्रमुख कीट एवं व्याधियां

छाल खाने वाली सुण्डी : यह तने में सुरंग बनाती है औरछल को खाती है . रोकथाम के उपाय: सूखी शाखाओं कोकाटकर जला दें तथा बाग को साफ सुथरा रखें. सितम्बरअक्तूबर में क्लोरवीर 35 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी केहिसाब से घोलकर सुराखों के चारों ओर लगाये तथा फ?वरी-मार्च में किसी पिचकारी की सहायता से 3-5 मि.ली. प्रति सुरंगडालें तथा सुराख को गीली मिट्टी से बंद कर दें.आंवले का रोली रोग (रस्ट) : इसके प्रकोप से पत्तियों पररोली के धब्बे बन जाते हैं. तथा कभी-कभी पूरे फल पर फैलजाते हैं. रोगी फल पकने से पहले ही झड़ जाते हैं.