"किराए की कोख पर लगाम"

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10 करोड़ रुपए महीने के कारोबार पर पड़ेगा असर

सरोगेसी के लिए सरकार ने जो पहल की है उसे स्वागत योग्य कदम तो बताया जा रहा है लेकिन इसके कई पहलुओं पर व्यापक बहस के बाद हीकड़े प्रावधान करने की जरूरत बताई जा रही है। भले ही अमदाबाद किराए की कोख के गढ़ के रूप में स्थापित हो चुका है और दिल्ली में उतनेबड़े पैमाने पर सरोगेसी का कारोबार नहीं फैला हो। फिर भी इसका बड़ा नेटवर्क यहां भी बन गया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जासकता है कि दिल्ली-एनसीआर में ही इस पर काम करने वाले करीब ढाई सौ केंद्र बन गए हैं। इस विधेयक को अगर राज्यसभा में भी मंजूरीमिलती है तो एनसीआर में करीब 10 करोड़ रुपए महीने के कारोबार पर असर पड़ेगा।
इस कानून की दरकार लंबे समयसे महसूस की जा रही थी। जानकारोंकी राय में भारत जैसे देश में इस तरहके प्रयोग को लेकर कई तरह केसवाल उठते रहे हैं। वहीं अभी भीदिल्ली जैसे इलाके में ऐसी महिलाएंया दंपति आते हैं जिन्हें बच्चा न होनेकी वजह से तलाक जैसी नौबत कासामना करना पड़ रहा है। प्रगतिशीलमहिला संगठन की महासचिव पूनमकौशिक का कहना है कि इस तरह केकड़े कानून की बड़ी जरूरत है।दिल्ली में वीपी सिंह कैंप, मदनपुरखादर सहित कई इलाके हैं जहां बड़ेपैमाने पर अंडाणुओं को दान करवानेया सरोगेसी के लिए तरह-तरह केप्रलोभन दिए जाते हैं या दबाव डालाजाता है। महिलाओं के बीच कामकरने वाले कुछ स्वयंसेवी संगठन भीइसके लिए गरीब महिलाओं को मोटीरकम का लालच देकर इसमें आने कादबाव डालते हैं।उसके बाद नौ-दस महीने के लिएवह महिला गायब हो जाती थी। वेबताती हंै कि मुंबई में एक महिला कीसरोगेसी प्रक्रिया के दौरान मौत हो गईथी। हैदराबाद में एक महिला काअपहरण करने के बाद सरोगेसीकराया गया था। इसी तरह के गलतप्रयोगों के कारण थाईलैंड में पूरी तरहसे सरोगेसी प्रतिबंधित है। इसेहतोत्साहित करने के लिए अनाथबच्चों के गोद लिए जाने की प्रक्रियाको सरल व त्वरित करने की दरकारहै। सरोगेसी दिल्ली में अभी उतनानहीं है जितना गुजरात या महाराष्ट्रमें। आइवीएफ तकनीक बहुत बड़ाकारोबार बना हुआ है। सरोगेसी मेंआइवीएफ तकनीक की मदद भी लेनीपड़ती है। वे बताती हैं कि एक महिलाऐसी आई जिसकी तीन बेटी है औरएक सरोगेसी से भी चाहिए, इस परलगाम लगाना जरूरी है।एम्स में काम कर चुके व महाराष्ट्रमें आइवीएफ सेंटर चला रहे डॉक्टरअमोल का कहना है कि मौजूदाविधेयक में कई प्रावधान हैं जिन परबड़ी बहस की दरकार है। विदेशी वव्यावसायिक इसेतमाल पर तो रोकलगनी चाहिए, लेकिन जरूरतमंदों कोरास्ता मिलना चाहिए। वे कहते हैं किमहिलाएं रिश्तेदारों के ताने सुन करतंग होकर ही बच्चे पैदा करने कोमजबूर होती हैं। ऐसे में सरोगेट कारिश्तेदार होने की शर्त व्यावाहरिकनहीं होगी। क्योंकि लोग रिश्तेदारों सेयह कमियां छुपाते हैं। दूसरे जिसकेगर्भाशय नहीं हो उसके शादी के पांचसाल तक इंतजार करने का अर्थ नहींहै। या जो मेडिकली अनफिट है वहक्या करे? एक अन्य डॉक्टर नेबताया कि लोग तो कड़े कानून कीतोड़ निकालना जानते हैं। कितने सेंटरइसलिए नेपाल या बांग्लादेश में खोललिए गए हैं। ताकि क्लिनिकल पार्टवहां व केयर वाले काम भारत में होसकें।हरियाणा में उत्तर भारत का पहलासरोगेसी केंद्र ह्यवंश सरोगेटह्ण खोलनेवाले बजरंग का कहना है कि आजभी एक मामला उनके पास आया हैजिसमें 28 साल की लड़की कोइसलिए तलाक दिया जा रहा है किवह मां नहीं बन सकती। उसका केसमहिला आयोग में भी गया। गांवों मेंबच्चे के लिए दूसरी शादियो काचलन आज भी है।रिश्तेदार लोग आज के समय मेंखून नहीं देते तो कोख कौन देगा? वेकहते हैं कि महिला आयोग ने जोअपनी तरह से कह दिया बस उसी केआधार पर कानून बना दिया जा रहाहै। वे बताते हैं कि आइवीएफ के तीनचक्र व सरोगेट मदर के लिए तीन सेचार लाख सहित कुल करीब दसलाख का खर्च एक सरोगेसी पर आताहै। वे बताते हैं कि एक अनुमान केमुताबिक करीब 10 करोड़ महीने काकारोबार दिल्ली में प्रभावित होगा।इसके लिए न केवल अस्पताल बल्किस्वयंसेवी संगठनोें व कानूनीजानकारों व मनोवैज्ञानिकों के नेटवर्ककी जरूरत होती है। वे खुद दिल्ली केचार-पांच बड़े अस्पतालों के पैनलपर हैं। वे कहते हैं कि कानून कीदरकार 16 सालों से महसूस की जारही थी।लेकिन भारतीय चिकित्सा परिषदने इसके लिए अभी तक दिशानिर्देशतक नहीं दिए थे। आइवीएफ तकनीककी जरूरत एक बड़ी आबादी कोविभिन्न कारणों से पड़ने लगी है।सरकार को इसके आसान बनाने कीदिशा में काम करने की दरकार है।सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की डॉक्टररंजना कुमारी ने कहा कि महिलाआयोग के साथ हमने एक शोध कियाथा जिसमें इस प्रयोग के हालात काजायजा लिया गया था। उसी आधार परहमने यह कानून बनाने की जरूरत परबल दिया था। यह कानून जरूरतमंदोंकी मदद व गलत उपयोग पर रोक केलिए हो इसलिए इसके प्रावाधानों कोखंगालने की जरूरत है।